कृष्ण सुदामा
द्वारिका नगरी के द्वारे पर, पुछत हरि को धाम सुदामा,,
पांव मे जूती न सर पे पगड़ी, पुछत नाम बताओ सुदामा,,
द्वारपाल से बोले विनय कर, बंधू ये संदेशा पहुंचा दो,,
द्वार पे प्रतीक्षा मे खड़ा है, मिलने को आयो है मित्र सुदामा,,
सैनिक के सुन वचन कन्हाई, नगे ही पांव दौड़ पड़े हैं,,
मित्र से मिलते हैं हो के समा सम, जेसो कन्हाई है वैसो सुदामा,,
प्रीत की रीत निभाते हरि है, जग को सीख सिखाते हरि है,,
भर के कोरिया कंठ लगायो, मित्र से मिलने कु मित्र है आयो,,
आशुन से है चरण पखारे, नेह का लेप लगाए रहे हैं,,
राजा औ रंक का भेद मिटा कर,मित्रता नव पाठ पढ़ा कर,,
इस्थापित आदर्श किया है, मानव धर्म सिखाए रहें हैं,,
Gopal Gupta" Gopal "
madhura
07-Jun-2023 12:35 PM
good
Reply
Sachin dev
14-May-2023 08:36 PM
Well done
Reply
सीताराम साहू 'निर्मल'
14-May-2023 08:55 AM
बहुत खूब
Reply